गणपति गली
यह उत्सव समाप्त हो चुका है, पर पंडाल खुला है।
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बाप्पा पटले पर विराजमान हैं। उन्हें उठाकर सजी हुई चौकी पर बिठाइए।



मूर्ति में प्राण आते हैं। हाथ रखिए और रोके रखिए — जब तक तेज न फैल जाए।

बाप्पा को दूर्वा सबसे प्रिय है। इक्कीस दूर्वा चढ़ाइए — थाली को छूते जाइए।




यहाँ तीनों एक ही जगह हैं — लड्डू लूटिए, मूषक दौड़ाइए, और जो कमाया वो बाप्पा को अर्पित कीजिए। खेल जितनी बार चाहें खेलिए; भंडार खाली हो तो फिर से कमा लीजिए।

दीप जल चुके हैं। थाली उठाइए और बाप्पा के सामने घड़ी की दिशा में घुमाइए।


घर लौटने का समय। बाप्पा को धीरे-धीरे जल में ले जाइए — अगले बरस तुम जल्दी आना।
खुलेगा 25 सितंबर