यमुना गली
यह उत्सव समाप्त हो चुका है, पर पंडाल खुला है।
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आधी रात, तूफ़ानी यमुना। वासुदेव कान्हा को सिर पर उठाए हैं — उन्हें पार ले जाइए।



मटकी ऊँची टँगी है और कान्हा छोटे हैं। उन्हें माखन तक पहुँचाइए।



नाग कुंड में बैठा है। कान्हा को उसके फन पर पहुँचाइए।


साँझ का मैदान सूना है। बंसी के सुर हवा में छोड़िए।



मटकी में दही है। रस्सी खींचिए, मथानी घूमेगी और माखन निकलेगा।



मूसलाधार वर्षा। पर्वत उठाकर गोकुल को ढक दीजिए।


चाँदनी में गोल मैदान सूना है। गोपियों को घेरे में बुलाइए।



यशोदा ने कहा — मुँह खोलो। देखते रहिए, हटिए मत।

यमुना का घाट शांत है। जल पर एक दीप रखिए।


दीपक जल गया। थाली को गोल घुमाइए।





यमुना किनारे, कान्हा का झूला। एक धक्का दीजिए।